हाल की अपनी कुछ सीख कहना चाहता हूँ। कहने की कोई जगह नहीं, इसलिए कंप्यूटर पर एक-एक अक्षर टाइप कर रहा हूँ।

सब जानते हैं कि किन वजहों से मेरे जीवन में बड़े उतार-चढ़ाव रहे हैं। लेकिन इससे दुनिया को समझने की मेरी क्षमता प्रभावित नहीं होती।

हक़ीक़त को जितना स्पष्ट समझते जाते हो, उतने ही दूसरों को अप्रिय लगने लगते हो। क्यों? क्योंकि दुनिया को तुम्हारे जैसे समझदार आदमी की ज़रूरत नहीं। बहुत ज़्यादा बातें समझ लेना अच्छा नहीं; लोग तुमसे नफ़रत करने लगेंगे।

मसलन, आज बीस से कुछ ऊपर की उम्र के एक अनजान व्यक्ति से शादी और प्यार पर बात हुई। उसने कहा कि प्यार के लिए सब छोड़ सकता है। थोड़ी चर्चा हुई और मैंने कहा, चलो तुम्हें एक कहानी सुनाता हूँ।

शंघाई की एक लड़की है। उसका तीन लोगों का परिवार चालीस वर्गमीटर से भी छोटे घर में रहता है। वह अब अट्ठाईस साल की है। उसका जीवन काफ़ी अच्छा है, कम से कम हमें तो यही कहती है, लेकिन उसका सपना बड़ा घर होना है। हमारे हिसाब से वह बहुत अमीर है—दस लाख युआन से अधिक नक़द है।

लेकिन जानते हो? शंघाई में इतने पैसे से शायद तीस वर्गमीटर का घर भी नहीं खरीदा जा सके। अपने गृहक्षेत्र में इससे हज़ार वर्गमीटर से बड़ा घर, बढ़िया सजावट और एक अच्छी गाड़ी मिल सकती है। उसने कहा: मेरे माता-पिता ने सारी ज़िंदगी शंघाई में बिताई है। मुझे कहीं भी जाने से फ़र्क़ नहीं पड़ता। मैं भी शंघाई छोड़कर शांत, धीमी रफ़्तार वाली जगह रहना चाहती हूँ, मगर माता-पिता नहीं जा सकते। मैं उनसे प्यार करती हूँ। चाहती हूँ कि वे बड़े घर में रहें और रोज़ी-रोटी के लिए भागते न रहें। मेरे पिता अब भी काम करते हैं। सेवानिवृत्त हो गए हैं, लेकिन आवासीय परिसर में सुरक्षा गार्ड की नौकरी करते हैं, ताकि घर के ख़र्च में थोड़ी मदद हो।

कहानी यहीं तक सुनाई, फिर उससे बहस करने लगा।

मैंने कहा: क्या इसे खुद को छोड़ देना कहोगे? तुम कहते हो कि प्यार के लिए सब त्याग सकते हो, लेकिन क्या अगली पीढ़ी का सोचा है? क्या तुम्हारे बच्चे भी तुम्हारी तरह सारी ज़िंदगी प्यार ढूँढ़ते रहें? या तुम्हारी तथाकथित स्थिर ज़िंदगी, तंगी की ज़िंदगी जिएँ? मैं ऐसा नहीं चाहता। अपने बच्चों की ज़िम्मेदारी लेनी होगी। वह लड़की भी ऐसा नहीं चाहती। मैं प्यार के लिए सब नहीं छोड़ूँगा, पर इसका मतलब यह नहीं कि प्यार में विश्वास नहीं करता। परिवार और प्यार को बचाने के लिए पैसा चाहिए, समझे?

चर्चा के दौरान वह नाराज़ होकर चला गया और बोला, यह सिर्फ़ तुम्हारी सोच है, मुझ पर थोप नहीं सकते। मैंने कहा, मैं थोप नहीं रहा, सिर्फ़ चर्चा है, विवाद नहीं। फिर भी वह चला गया।

तब मेरे मन में आया: दिमाग़ बहुत छोटा, हास्यास्पद और शर्मनाक। जो आदमी बच्चों का नहीं, सिर्फ़ अपना सोचता है वह दयनीय और ग़ैरज़िम्मेदार है। सोचो उससे क्या काम हो सकता है।

साथ ही सोचा, शायद मैं बहुत कट्टर हो रहा हूँ। सबका जीने का तरीक़ा अलग है, शायद वह खुश रहेगा?

फिर अचानक खुद को बहुत अयोग्य कहा। लोगों की सोच क्यों नहीं बदल सकता, ताकि वे वास्तविकता को समझें, उसके आगे झुकने के बजाय उसका विरोध करें?

अनुभव अलग हैं, इसलिए सोच अलग है। सबकी सोच नहीं बदल सकते, लेकिन तरीक़ों से उन्हें वश में कर सकते हो, उनका ब्रेनवॉश कर सकते हो, या लोकतंत्र का इस्तेमाल करके धोखा दे सकते हो।

बहस करना असल में मूर्खता है। शांत होकर बात करें और जिएँ। बहुत पहले ही मेरा ग़ुस्सा कम हो चुका है, और अब बहस करने का मन भी नहीं।