हाल में बहुत बेबस, बहुत दयनीय महसूस करता हूँ। घर लौटना चाहता हूँ, लेकिन घर का ख़याल आते ही समझता हूँ कि वहाँ भी लौट नहीं सकता।

अच्छे से काम करना चाहता हूँ। हर दिन खुद को ढेरों हौसला देने वाली बातें कहता हूँ, मगर लोगों से मिलूँ तो लगता है कि हर बात मन के विरुद्ध जाती है।

बहुत चिढ़ा हुआ हूँ। जीवन इतना हास्यास्पद, ज़िंदगी इतनी मज़ाकिया क्यों है? क्या ईश्वर मेरे साथ मज़ाक कर रहा है? या मैं अच्छी ज़िंदगी के लायक ही नहीं हूँ? तुम्हें याद करता हूँ, अतीत याद आता है। जितना सोचता हूँ उतना खुद को मूर्ख, हास्यास्पद, बड़ा बेवकूफ़ और नासमझ पाता हूँ। कुछ भी ठीक से सँभाल नहीं पाया। बहुत कुछ छोड़ा जो नहीं छोड़ना चाहिए था, और बहुत कुछ उठाया जो नहीं पाना चाहिए था। अब बस पछतावा है, अंतहीन पछतावा।

अपनी ग़लतियों और हर छोटे ब्योरे पर पछताता हूँ। सोने से पहले बचपन की ग़लतियाँ, कल की ग़लतियाँ, सारी ग़लतियाँ याद आ जाती हैं। सपनों में भी वही सब है।

कहीं चुपचाप बैठ जाना चाहता हूँ, लेकिन ऐसी जगह रही नहीं। दादी नहीं रहीं, बहन भी संभव नहीं। पिता, माँ, भाई—संभव नहीं। उनके अलावा कहीं और जा भी नहीं सकता। जीवन खुद ही सँभालना होगा। इतनी बेबसी, इतनी निराशा—सहारा लेने को एक व्यक्ति भी नहीं।

मुझे धैर्यहीन या कमज़ोर मत समझिए। यह जीवन का सिर्फ़ एक हिस्सा है। मैं अभी बहुत युवा हूँ, मेरा भविष्य है, और मेरे भीतर एक दृढ़ दिल अब भी है।

चैट रिकॉर्ड, वांग हुइमिन।