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शांत मनःस्थिति।
लेख की विषय-सूची
कहते हैं कि मनःस्थिति बहुत महत्त्वपूर्ण है। मैं पूरी तरह सहमत हूँ। अच्छी मनःस्थिति के बिना कठिन दिन कैसे काटे जाएँ?
चीज़ों और लोगों के प्रति अपनी मनःस्थिति की बात करता हूँ।
कोई छींकता है तो कहता है, कौन मुझे बुरा कह रहा है? लेकिन मैं पहले सोचता हूँ, कौन मुझे याद कर रहा है? इतनी छोटी बात से भी किसी की सोच समझी जा सकती है। मैं खुला और खुशमिज़ाज आदमी हूँ, जीवन के आगे कम ही समझौता करता हूँ, अपनी तरह जीता हूँ।
बेबस भी रहा हूँ। सोचता था कि बेजोड़ हूँ, बड़ी योजनाएँ हैं, पर उन्हें लागू करने की जगह नहीं। बहुत काम किए; हालाँकि वे सब अंत में असफल हुए, फिर भी लगता है कि आगे बढ़ा हूँ। दस साल की उम्र से उन्नीस तक, अब लगभग बीस—समाज में दस साल से भटक रहा हूँ।
इतनी बातें कहने के बाद पूछूँ, मुझे बेबस और असहाय क्या करता है? आसपास कोई ऐसा नहीं रहा जिसके साथ लंबे समय काम कर सकूँ—कोई लंबे समय का साथी, जीवनसाथी, या मेरे साथ लड़ता रहने वाला। भाई, दोस्त, औरत—एक भी नहीं।
सालों से समाज में अकेला ही चलता रहा हूँ। शायद ऐसे एक व्यक्ति की कमी से ही बहुत नुकसान उठाया है।
कभी थोड़ा सहारा चाहूँ तो वह भी नहीं मिलता। बहुत बार ऐसा होता है। असल में शायद मैं खुद मदद नहीं लेना चाहता। मेरी ज़िद्दी, हार न मानने वाली प्रकृति ने ही मुझे आज इस ज़िंदगी तक पहुँचाया है।
आज इतना ही। समय मिलेगा तो आगे लिखूँगा।