6 अप्रैल 2010 को हुबेई प्रांत के गोंगआन काउंटी से घर लौटते समय हानकोउ रेलवे स्टेशन पर एक लड़की से मिलने का सौभाग्य मिला। वह उस साल कॉलेज के तीसरे वर्ष में थी—सुघड़, प्यारी और कोमल, एक चमकता हुआ मोती।

नोट: स्टेशन में जाकर मैं अपनी याद के मुताबिक़ प्रवेश द्वार पर टिकट जाँच का इंतज़ार करने लगा। तभी उसे देखा। पूरे उत्साह और हिम्मत के साथ उससे बात की। उसके बाद जो सिलसिला चला, उसकी कभी कल्पना नहीं की थी।

यह सब बड़ा अजीब था। मैं ग़लत टिकट जाँच बिंदु पर चला गया, अपनी तय जगह के बजाय ग़लत सीट पर बैठ गया, और इस तरह हमारी पहचान हुई।

हम।

तीन साल तक हम मिले नहीं। संपर्क भी टूटता-जुड़ता रहा। इन तीन सालों में बहुत कुछ हुआ, लेकिन हमारी उम्मीदें हमेशा सुंदर रहीं।

तीन साल।

इन तीन सालों में बहुत कुछ हुआ। तुमने पढ़ाई पूरी की, नौकरी शुरू की। मैं मायूसी से बाहर निकला और जीवन के ऊँचे दौर में पहुँचा, लेकिन यह सब सिर्फ़ शुरुआत है।

कल।

हम फिर मिले। मैंने दरवाज़ा खोला, तुम्हें न चूमा, न गले लगाया; बस मुड़कर अपने कमरे में बैठ गया। तुमने कहा, कितना मिलता-जुलता है—तीन साल पहले भी तुम इसी तरह चले गए थे, वही पीछे से दिखता रूप। मैं उलझे हुए मन से यह सब सोचता रहा।

मैंने ऐसा इसलिए किया क्योंकि मेरी ज़िंदगी बहुत उलझी हुई है। किसी प्यारी लड़की को प्रभावित नहीं करना चाहता, उसे अपनी अव्यवस्थित ज़िंदगी में उलझाना नहीं चाहता। नहीं चाहता कि वह झूठ के बीच जिए या मेरे साथ ऐसा बिखरा जीवन बिताए। बहुत-सी बातें हैं जिन्हें कह नहीं सकता। किसी का वक़्त बर्बाद नहीं करना चाहता।

मैं।

ऐसा नहीं कि चाहता नहीं या प्यार नहीं करता। बल्कि कितना मूर्ख हूँ—मैं डर गया, डर गया, ठीक तुम्हारे डर की तरह, उस यथार्थ की तरह जिसकी तुम बात करती हो।