एक पाठक की टिप्पणी: ऊँच-नीच की सोच में डूबे बुज़ुर्ग अपनी प्रतिष्ठा बचाने के लिए ग़लती पर अड़े रहते हैं।

अगर इंसान ज़िद्दी हो और सीखना न चाहे, तो बुढ़ापे में उसकी उम्र भर मेहनत करके बचाई संपत्ति समाज की मार से धीरे-धीरे खाली हो सकती है।
(अपनी ही करनी से सब गँवा देना)

बुरी जीवनशैली से पैदा बीमारियाँ आपकी बचत खा जाएँगी। सेल्समैन की मीठी बातें, हर बीमारी ठीक करने का दावा करने वाले स्वास्थ्य उत्पाद, तथाकथित मुफ़्त यात्राएँ, झांग और ली जैसे नौजवानों का आपका हालचाल पूछकर ख़याल रखना, निवेश के साथ लाभांश, यूनिवर्सल लाइफ़ बीमा, पैतृक इलाके में वंशावली का नवीनीकरण, कुल के रिश्तेदारों का पैसे उधार माँगना, वगैरहभी आपको बार-बार जेब से पैसा निकालने पर मजबूर करेंगे।

आख़िर में पैसा ख़त्म, शरीर टूट चुका, पारिवारिक रिश्ते कट गए और बच्चे भी आपको नापसंद करने लगे। शायद यही चीन के बहुत से बुज़ुर्गों के अंतिम वर्षों की त्रासदी है।

किशोरावस्था में अक्सर बुज़ुर्गों को निशाना बनाने वाली ठगी सुनता था।तब समझ ही नहीं पाता था: इतनी आसान ठगी पर लोग विश्वास क्यों करते हैं और बचाव क्यों नहीं जानते? वे दादा-दादी जैसे बुज़ुर्ग देखने में मूर्ख भी नहीं लगते थे।

लेकिन लगता था, ठग कुछ भी डींग हाँक दें तो सफ़ेद मूली को भी वे जिनसेंग का फल मान सकते हैं।

चीन छोड़े दो साल बाद पीछे मुड़कर देखा, तो धीरे-धीरे समझ आया कि बहुत सी बातें सिर्फ़ आसानी से ठगे जाने जितनी सरल नहीं हैं।

अब अधिकाधिक लगता है कि बहुत लोगों की पूरी ज़िंदगी जैसे पहले ही तय कर दी गई हो।ख़ास वातावरण और व्यवस्था में उनके भीतर ऐसी सोच बन गई जिस पर सवाल उठाना मना है।

उम्र बढ़ने पर ज़िद और प्रतिष्ठा बचाने की चाह उन्हें वापस मुड़ने से और रोकती हैं।

कभी बात यह नहीं होती कि सामने का गड्ढा दिखता नहीं। बल्कि ठगे जाने को मान लें तो मानना पड़ेगा कि अपने फ़ैसले में ग़लती थी; यहाँ तक कि दशकों से जिन बातों पर विश्वास किया, वे भी ग़लत हो सकती हैं।

उनके लिए यह कुछ पैसा गँवाने से अधिक कठिन है।इसलिए गड्ढा जानते हुए भी उसमें कूदते जाते हैं। पैसा ख़र्च करते रह सकते हैं, लेकिन ग़लती नहीं मान सकते, वरना इज़्ज़त कहाँ बचेगी?

ऊँची शिक्षा वाले बुद्धिजीवी, यहाँ तक कि प्रोफ़ेसर भी ज़रूरी नहीं कि अपवाद हों।शिक्षा का स्तर और सीखते रहने तथा आत्मचिंतन की इच्छा दो अलग बातें हैं।

कितनी भी ऊँची शिक्षा हो, इसका मतलब यह नहीं कि “मैं ग़लत हो ही नहीं सकता” वाली ज़िद छोड़ सकते हैं।मुझे बेबस करने वाली बात यह है कि यह सिर्फ़ किसी एक के स्वभाव का मुद्दा नहीं, बल्कि अधिकतर लोगों का है। इस समस्या की वजहों का उन्हें गढ़ने वाले वातावरण और व्यवस्था से बहुत गहरा संबंध है।

अपने माता-पिता, रिश्तेदारों और दोस्तों के लिए भी चिंता किए बिना नहीं रह सकता कि कहीं उनका अंत भी ऐसा ही न हो।

लेकिन धीरे-धीरे बुज़ुर्गों से इन बातों पर चर्चा छोड़ दी। इसलिए नहीं कि परवाह नहीं है; बहुत बार लगता है कि उन्हें गड्ढे से बचा रहा हूँ, दिल से समझाता हूँ, मगर उन्हें लगता है कि उनकी इज़्ज़त घटा रहा हूँ। बस उनके भाग्य का सम्मान कर सकता हूँ।