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कुछ एहसास
लेख की विषय-सूची
दो साल बाद धीरे-धीरे उस मुश्किल दौर से बाहर निकल आया हूँ। जीवन भी धीरे-धीरे सामान्य हो रहा है। बहुत कुछ छोड़ा, बहुत कुछ त्यागा, तब आज तक पहुँचा।
इंसानी फ़ितरत का इतनी जल्दी सामना करने से बेहद मज़बूत बना, लेकिन बेहद दुखी भी हुआ। उसके अँधेरे पक्ष से बहुत कम उम्र में परिचित होना अच्छा नहीं।
तेरह साल की उम्र में दुनिया में कदम रखा, अब बीस का हूँ। नादानी से स्वार्थपरता, फिर परिपक्वता और सादा जीवन चाहने तक—यह बदलाव आसानी से नहीं आया।
गाली सुनते ही उछल पड़ने से लेकर सहज स्वीकार करने तक—समय सचमुच दिलचस्प चीज़ है।
बस, इतना ही, इतना ही। कहने को ज़्यादा नहीं, और बहुत कुछ लिखना भी नहीं चाहता।